– कहते हैं प्यार हर दर्द पर भारी होता है,लेकिन जब सिस्टम ही लाचार हो जाए, तो इंसान की मजबूरी उसका सबसे बड़ा दुख बन जाती है। कवर्धा के एक छोटे से गाँव में रहने वाला समलू मरकाम पिछले तीन सालों से अपनी पत्नी के कैंसर से लड़ाई में अकेला योद्धा बनकर खड़ा है।मोटरसाइकिल को एम्बुलेंस बना लिया, उम्मीद को हिम्मत बना लिया,पर अब सवाल है, क्या सरकार उसकी पुकार सुनेगी
कवर्धा जिले के रेंगाखार वनांचल क्षेत्र के नगवाही (काटाबहरा) गाव का यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, हकीकत का दर्द है।तीन साल पहले समलू मरकाम की पत्नी कपूरा मरकाम को थायराइड कैंसर का पता चला।गरीबी ने रास्ते रोके, पर पति का प्यार और जज़्बा नहीं रुका।कभी रायपुर, कभी दुर्ग, कभी भिलाई , हर अस्पताल के दरवाज़े पर उसने उम्मीद से दस्तक दी। मोटरसाइकिल में बंधा एक पाटा, जिस पर बैठकर कैंसर से जूझती पत्नी अपने पति की हिम्मत पर टिकी है। मुंबई भी इलाज के लिये गये परन्तु गरीबी ने रास्ते बंद कर दिये।समलू कहता है मैंने अपने हाथों से उसे मरते नहीं देखा, इसलिए लड़ रहा हूँ…मुंबई तक ले जाना चाहता हूँ, पर हालात नहीं जाने देते। यह आवाज़ सिर्फ समलू की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों परिवारों की है जो बीमारी से नहीं, सिस्टम की बेरुखी से हार रहे हैं।तीन साल से सरकारी अस्पतालों के चक्कर लगा रहे समलू को अब उम्मीद है कि कोई मदद का हाथ आगे बढ़े।गाँव में गरीबी, शहर में खर्च, और बीच में टूटा हुआ सिस्टम,इन सबके बीच एक पति अपनी पत्नी के लिए हर दर्द झेलने को तैयार है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जहाँ सिस्टम रुक जाए, वहाँ इंसानियत को आगे बढ़ना चाहिए। कवर्धा का समलू मरकाम सिर्फ एक नाम नहीं,वो उन लोगों की उम्मीद है जो अपने दर्द में भी प्यार और ज़िद को ज़िंदा रखते हैं। मंत्री, विधायक सभी लोगों के चक्कर काट चुका परन्तु मदद नही मिला. –
